बुधवार, 25 सितंबर 2013

इम्तिहान

निडर  
निसंकोच वह 
मां के सामने ढल बन कर 
खड़ा हो गया 
दहशतगर्दो को चुनौती 
देने की मुद्रा में आ गया 
नैरोबी के उस मॉल में 
नन्हा प्रम्सु उन 
दहश्गर्दो की संवेदनाओ का 
इम्तिहान लेने का दुस्साहस 
करने लगा 

पर उसे शायद पता नहीं की 
वह धूर में जेउर 
पूराने का प्रयास कर रहा 
वे वीर नहीं 
जो उसके इस कदम पर 
ठहर जायेगे 
उसके इस असीम साहस का 
इस्तकबाल करेंगे 

यह तो उन कायरो की जमात है 
जो अपने झूठी शानो की 
नुमेंदगी  हेतु 
निहत्थो पर हथियार 
चलने वाली कौम की भरमार है 
अपने से मजबूत के सामने तो ये 
पानी भरते नजर आते है 
अपने से  कमजोरों पर
 जुल्म ढहाने  में 
जरा भिनाही हिचकिचाते है 
महिलाओं और बच्चो पर भी 
तरस इन्हें नहीं आता  है 
पता नहीं इनके खुदा  ने इन्हें 
किस मिट्टी से बनाया है 

अरे बहादुर इतने तो 
अमेरिका पर कूच करो 
अपने मंसूबे का 
अंजाम मुकम्मिल हासिल करो 

पर ऐसा क्यों करेंगे 
इन्हें तो आशय शिकारों की 
तलाश रहती है 
अपने हथियारों पर सिर्फ 
धर लगाने की जरूरत रहती है 

अपनी कौम को मुर्ख 
और अपने में झूठा दंभ 
भरना चाहते है 
बदले माँ असहाय  अबलाओं  और 
मासूमो की बलि चाहते है 

पता नहीं इनके  सीने  में 
कैसा  दिल  था 
जिसने शायद पसीजना 
नहीं सीखा था 
उस मासूम के सीने को 
तत्काल गोलियों से छलनी 
कर दिया था 
इशान और इन्शानियत को 
शर्म से ज्यादा भी शर्मशार 
कर दिया था 

माँ  मुक्ता  ने उसे भीच कर 
सीने से लगा लिया 
उसके कलेजे के टुकडे  ने 
उसके सामने ही दम 
तोड़ दिया था 

माँ की  ममता चीत्कार 
कर उठी 
जाना था जिसके कंधो पर 
आज उसीकी लाश 
बेबस वह  ढो  रही 
वह सोच रही थी की 
उसके बच्चे ने शायद 
अपने दूध का कर्ज 
तो अदा कर दिया 
पर भगवन ने उसे 
अपने माँ का फर्ज 
पूरा करने का मौका ही 
नहीं दिया
काश वह समय से 
एक त्वरित  निर्णय ले पाती 
गोली लगाने से पहले 
अपने बच्चो को 
अपने अंक में समां लेती 
अपने को कुर्बान कर 
अपने बच्चे को 
 काश  बचा लेती 

निर्मेश 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें